इस क्रान्ति को ईश्वर का समर्थन हासिल है

grey इस क्रान्ति को ईश्वर का समर्थन हासिल है

ईरान में इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के नेतृत्व में इस्लामी क्रान्ति की सफलता और मूल इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर सरकार के गठन ने राजनीति की दुनिया में नए अध्याय को जोड़ा। विभिन्न क्रान्तियों व सरकारों के अस्तित्व का औचित्य पेश करने वाले विचारों में इस्लामी क्रान्ति एक अद्वितीय घटना थी। यह ऐसी घटना थी जो राजनेताओं के पारंपरिक समीकरणों से समन्वित नहीं थी। इस्लामी क्रान्ति मौजूदा सदी में होने वाली दूसरी क्रान्तियों से कोई समानता नहीं रखती है। कैनेडा के विद्वान रॉबर्ट कॉल्सटन कहते हैं, “मेरी नज़र में जबकि मैं पश्चिम का ग़ैर मुसलमान व्यक्ति हूं, यह एक चमत्कार है कि एक पंथ पर आधारित व ईश्वरीय क्रान्ति आज की दुनिया में इस तरह फैले और न्याय की स्थापना की दिशा में आगे बढ़े। इस बात में शक नहीं कि इस क्रान्ति को ईश्वर का समर्थन हासिल है।”

.

मीशल फ़ूको ने ईरान की इस्लामी क्रान्ति को उत्तर-आधुनिक क्रान्ति माना है और राजनैतिक आध्यात्मिकता को इस्लामी क्रान्ति के संबंध में अपनी समीक्षा का आधार क़रार दिया है। वह कहते हैं, “इस्लामी क्रान्ति एक ओर इस्लामी समाज के पारंपरिक ढांचों के लिए सुनियोजित व स्थायी रोल अदा करने के लिए एक अभियान तो दूसरी ओर राजनैतिक जीवन में आध्यात्मिक आयाम को शामिल करने का साधन थी।”

.

जिस वक़्त हम पश्चिमी विचारकों के विचारों पर नज़र डालते हैं तो हम देखते हैं कि उन्हें ईरान की इस्लामी क्रान्ति के संबंध में कितनी हैरत है। उनकी यह हैरत बेजा भी नहीं लगती क्योंकि पश्चिम शताब्दियों से धर्म को राजनीति से अलग मानता आ रहा है। इस्लामी जगत में भी इस्लामी सभ्यता के पतन के बाद यह विचार विद्वानों में बल पकड़ता गया कि राजनीति की दुनिया व राजनैतिक गतिविधियों से धर्म के दामन पर धब्बा लगता है। प्रसिद्ध समाज सुधारक सय्यद जमालुद्दीन असदाबादी के शिष्य शैख़ मोहम्मद अब्दोह राजनैतिक गतिविधियों से होने वाली कुन्ठा के बाद कहते हैं, “ईश्वर की शरण चाहता हूं राजनीति, इसके शब्द, अर्थ और हर उस शब्द से जिसे राजनीति में बोला जाता है और राजनीति के बारे में हर उस विचार से जो मन में आता है और उस भूमि से जहां राजनीति को याद किया जाता है और हर उस व्यक्ति से जो राजनीति की बात करता है, उसकी शिक्षा देता है, उसके बारे में या उससे जुड़ी चीज़ों के बारे में सोचता है, पनाह चाहता हूं।

.

राजनीति से धर्म को दूर रखने के विचार के दो स्रोत हैं। कुछ लोग संभव है इसलिए इस विचार के समर्थक हैं क्योंकि उनका यह मानना है कि धर्म में राजनीत के लिए ज़रूरी साधन नहीं हैं। इस गुट के विचारकों के बारे में इमाम ख़ुमैनी ने अपनी वसीयत में लिखा है, “पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के आचरण से शासन व राजनीति के बारे में जितने निर्देश मिलते हैं उतना अन्य चीज़ों के बारे में नहीं है, बल्कि इस्लाम के उपासना से संबंधित बहुत से निर्देशों में राजनीति व उपासना दोनों आयाम मौजूद हैं और इन्हीं निर्देशों की ओर से लापरवाही के कारण इस्लामी जगत के सामने ये मुसीबतें खड़ी हुयीं हैं।” कुछ दूसरे विचारक हैं जिनका धर्म के संपूर्ण होने पर विश्वास है किन्तु साथ ही उनका यह भी मानना है कि राजनीति की दुनिया के धोखा, झूठ और अत्याचार इत्यादि से दूषित होने के कारण, धर्म के दामन पर राजनैतिक गतिविधियों का धब्बा नहीं लगना चाहिए।

.

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह इस दूसरे विचार को इस्लामी जगत के लिए बहुत बड़ी त्रासदी मानते थे और इस विचार के प्रचार को इस्लामी जगत के दुश्मनों का षड्यंत्र बताते थे जो इस तरह इस्लामी भूमि पर साम्राज्य के बुरे साये को फैलाना चाहते हैं।

.

आम बोल-चाल में राजनीति का नकारात्मक अर्थ निकाला जाता है जिसमें मक्कारी, धोखेबाज़ी, जालसाज़ी और झूठ शामिल है। लेकिन इस बिन्दु पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि यहां राजनीति से मुराद यह राजनीति नहीं है जिसमें धोखा व झूठ हो। बल्कि यहां राजनीति का मतलब देश के संचालन का नियम है। और स्पष्ट शब्दों में राजनीति का अर्थ समाज के मामलों का इस तरह संचालन की उसके भौतिक व आध्यात्मिक सभी हित पूरे हों।

.

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने इस्लाम के समृद्ध होने पर विश्वास और पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण के अनुसरण के साथ राजनीति को हक़ीक़त में धर्म का अनुसरण माना और ईश्वरीय आदेशों व निर्देशों को लागू किए बिना धर्मपरायणता को अधूरा मानते थे।

.

जिस समय इमाम ख़ुमैनी ने आंदोलन शुरु किया उस समय धार्मिक हल्क़ों में धर्मगुरु के राजनीति में प्रवेश को अच्छा नहीं समझा जाता था यहां तक कि राजनीति में सक्रिय धर्मगुरु को अधर्मी समझा जाता था, किन्तु इमाम ख़ुमैनी ने पवित्र क़ुरआन की प्रकाशमयी शिक्षाओं व पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण को आधार बनाकर दूसरी शैली अपनायी। उनका मानना था कि पहलवी शासन के अत्याचार व अपराध पर ख़ामोशी इन अपराधों में भाग लेने जैसा था और शुरु में उन्होंने समाज की स्थिति व क्षमता के मद्देनज़र शासन के व्यवहार में सुधार की कोशिश की किन्तु  कुछ समय बाद जब जनता में जागरुकता बढ़ी और धार्मिक भावना जागृत हुयी तो इमाम ख़ुमैनी ने जब उन्हें तत्कालीन शासन में सुधार की उम्मीद नज़र न आयी तो शासन को बदलने के उद्देश्य से अपने संघर्ष का नया चरण शुरु किया।

 .

दुनिया के बड़े बड़े विचारकों का यह मानना है कि इमाम ख़ुमैनी बीसवीं शताब्दी में इस्लामी जागरुकता के ध्वजवाहक रहे हैं। उन्होंने ऐसी क्रान्ति की बुनियाद रखी जो इस्लाम के बारे में दृष्टिकोण को बदल सकी और दुनिया पर छायी वर्चस्ववादी व्यवस्था के समीकरणों पर अपने प्रभाव प्रकट किया। इमाम ख़ुमैनी धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर लोगों को पिट्ठू पहलवी शासन के अमानवीय व धर्म विरोधी व्यवहार और इस्लामी जगत में बड़ी शक्तियों के अपराधों की ओर से जागरुक किया। इमाम ख़ुमैनी ने जागरुकता के ज़रिए मुसलमानों को मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया था और वह कहा करते थे, पूरी दुनिया के मुसलमानों उठ खड़े हो। हे इस्लामी जगत के धर्मगुरु! इस्लाम, मुसलमान इलाक़ों और मुसलमानों की मदद को पहुंचे! ईरानी राष्ट्र व सरकार और इस व्यवस्था के धर्गुरुओं व भले लोगों की तरह हर जगह पश्चिम व पूरब के अत्याचारियों को नकारिए और उनके तेल लूटने वाले सलाहकारों, झूठे विशेषज्ञों व पिट्ठु कारिन्दों को अपने शहरों से निकाल बाहर कीजिए और ईरानी जियालों की तरह शहादत को अपमान पर, इस्लामी सम्मान व मानवता को दुनिया के कुछ दिनों के लज्जाजनक जीवन पर प्राथमिकता देते हुए राजनैतिक व सैनिक लड़ाई के मैदान में उनसे आगे निकलिए और उनके प्रचारिक हंगामों से मत घबराइये कि महान ईश्वर आपके साथ है।

.

इमाम ख़ुमैनी  का आंदोलन लोगों को सिर्फ़ जागुरुक बनाने तक नहीं चला। इमाम ख़ुमैनी ने इन समस्याओं के हल के लिए पवित्र क़ुरआन व पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण पर आधारित कार्यक्रम पेश किया और वह धार्मिक सरकार की स्थापना की। युवा इमाम ख़ुमैनी  के व्यक्तित्व व बातों में एक ऐसे नेता की झलक देख रहे थे जो धार्मिक होने के साथ साथ क्रान्तिकारी व साठगांठ न करने वाला भी है। ऐसा नेता जो देश की समस्याओं और मानव समाज की मुश्किलों का हल धार्मिक आधार पर पेश कर सकता था। इमाम ख़ुमैनी की इस्लाम पर गहरी नज़र थी और वे इस्लाम के बारे में अधूरी समझ की ओर से सचेत करते रहते थे और इसे विदेशियों का षड्यंत्र बताते थे। इमाम ख़ुमैनी  धर्मगुरुओं से अनुशंसा करते हुए कहते थे, “आप इस्लामी नियमों और उसके सामाजिक प्रभाव व फ़ायदों के बारे में लिखिए और प्रकाशित कीजिए। अपनी गतिविधियों व प्रचार की शैली को संपूर्ण कीजिए। आत्म विश्वास रखिए और जान लीजिए कि आप लोग ऐसा कर सकते हैं। लोगों को इस्लाम के बारे में बताएं ताकि नई नस्ल यह न सोचने लगे कि धर्मगुरुओं का राजनीति से कोई काम नहीं है और धर्म को राजनीति से अलग होना चाहिए। इस बात का साम्राज्यवादियों व अधर्मियों ने प्रचार किया है कि धर्म को राजनीति से अलग होना चाहिए और धर्मगुरुओं को सामाजिक व राजनैतिक मामलों में नहीं बोलना चाहिए।”

.

इस आधार पर इमाम ख़ुमैनी  ने राजनैतिक इस्लाम को कि जो शुद्ध इस्लाम है, अमरीकी इस्लाम के मुक़ाबले में पेश किया। अमरीकी इस्लाम से अभिप्राय वह इस्लाम है जो अत्याचार अन्याय व साम्राज्य के मुक़ाबले में ख़ामोश रहे। साम्राज्यवादी ऐसे इस्लाम को अपने लिए कोई ख़तरा नहीं समझते क्योंकि ऐसे धर्म के अनुयाई लक्ष्यहीन होते हैं जिनका दुनिया की घटनाओं पर ख़ास असर नहीं होता। इमाम ख़ुमैनी  ने इसके विपरीत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के आचरण के आधार पर इस्लामी सरकार के गठन और मुसलमानों के हितों के ख़िलाफ़ साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र को नाकाम बनाने पर बल दिया। इमाम ख़ुमैनी  कहते थे, “इस्लाम ऐसे जियालों का धर्म है जो सत्या व न्याय चाहते हैं। उन लोगो का धर्म है जो स्वतंत्रता व स्वाधीनता चाहते हैं। इस्लाम संघर्षकर्ताओं व साम्राज्य विरोधियों का धर्म है। किन्तु साम्राजवादी धर्म को दूसरी तरह पहचनवाते हैं। उन्होंने यह दुष्प्रचार किया है कि इस्लाम संपूर्ण धर्म नहीं है, समाज के लिए व्यवस्था व क़ानून नहीं है। प्रशासन के नियम नहीं हैं। यह दुष्प्रचार इसिलए है ताकि इस्लाम की क्रान्तिकारी विशेषता को उससे ख़त्म कर दें और मुसलमानों को प्रयास और आंदोलन न करने दें।”

.

ईरान में इमाम ख़ुमैनी  के नेतृत्व में इस्लामी क्रान्ति की सफलता और इस्लामी नियमों व मूल्यों के आधार पर इस्लामी गणतंत्र की स्थापना इस्लामी समाजों के इतिहास में निर्णायक मोड़ समझी जाती है। हर प्रकार के षड्यंत्र के ख़िलाफ़ इस्लामी ईरान का प्रतिरोध और वैज्ञानिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक क्षेत्र मे उसकी उन्नति ने दुनिया के पीड़ितों व मोमिनों के मन में उम्मीद की किरण पैदा कर दी है। इसके बाद इस्लामी देशों में जागरुकता की लहर ने ज़ोर पकड़ा और जैसा कि पिछले कुछ साल में यह बात देखने में आ रही है कि मुसलमान अब पश्चिम पर निर्भर सरकार को बर्दाश्त करने के लिए तय्यार नहीं हैं और वे शुद्ध इस्लाम की ओर लौटना चाहते हैं। हालांकि अमरीका की अगुवाई में साम्राज्य विभिन्न हथकंडों से इन आंदोलनों को उसके मार्ग से हटाने की कोशिश में लगा हुआ है किन्तु इन सब मुश्किलों के बावजूद जैसा कि वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई ने कहा है कि जागरुकता की इस लहर को दबाया नहीं जा सकता। 

 

 

sharethis इस क्रान्ति को ईश्वर का समर्थन हासिल है

विचार व्यक्त करें

आपका ई-मेल प्रकाशित नहीं किया जाएगा.
द्वारा मार्क किए गए स्थान अनिवार्य हैं * .

*


8 − = پنج

हमसे संपर्क करें | RSS | साइट का नक्शा

इस वेबसाइट के सभी अधिकार इस्लाम14 के पास सुरक्षित हैं, वेबसाइट का उल्लेख करके सामग्री उपयोग किया जा सकता है। .