ईरान की इस्लामी क्रांति का उल्लेख

grey ईरान की इस्लामी क्रांति का उल्लेख

 

20वीं शताब्दी विशेषकर उसके अंतिम पचास वर्षों में जो सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए वे इस बात के सूचक हैं कि उस काल में कुछ देशों में विभिन्न क्रांतियां व  सामाजिक परिवर्तन हुए जो सरकारों के बदलने का कारण बने। अलबत्ता ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले इन समस्त परिवर्तनों में समान बात यह थी कि एक क्रांति घटित होकर विश्व की एक शक्ति से अलग होकर दूसरी शक्ति से जुड़ जाती थी। वास्तव में कहना चाहिये कि विश्व ने यह स्वीकार कर लिया था कि पूर्वी कम्युनिस्ट ब्लाक या पश्चिम की पूंजीवादी लिबरल व्यवस्था को स्वीकार करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।

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इस प्रकार की परिस्थिति में ईरान की इस्लामी क्रांति ने पूरब और पश्चिम का इंकार  करके और इस्लाम के जीवनदायक सिद्धांतों पर बल देने के साथ दुनिया के समीकरणों को परिवर्तित कर दिया। इस क्रांति का आधार धार्मिक मूल्य थे और यह इमाम ख़ुमैनी जैसे वरिष्ठतम शीया धर्मगुरू के नेतृत्व में सफल हुई। यह वह समय था जब बड़ी शक्तियां कदापि यह सोच ही नहीं सकती थीं कि उनसे हटकर कोई क्रांति या परिवर्तन हो सकता है। कम्युनिस्ट विचारधारा में धर्म को राष्ट्रों की निश्चेतना के कारक के रूप में पहचाना जाता था जबकि लिबरल विचारधारा में धर्म को राजनीति से अलग और एक व्यक्तिगत चीज़ माना जाता था परंतु ईरान में इस्लामी क्रांति के आने से विश्व ऐसी क्रांति का साक्षी था जिसने धर्म को अपना मूल आदर्श बनाना। इस क्रांति की विशेषता धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की ओर वापसी थी।

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इसी कारण उसने विश्ववासियों के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था। इस्लामी क्रांति से पहले ईरान में जो सरकार थी उसका प्रयास लोगों के ईमान और आस्था को  कमज़ोर करना था परंतु इस्लामी मूल्य जनता के आंदोलन का केन्द्र बने जबकि पहलवी सरकार धार्मिक नेताओं से विमुख करके ईरान में पश्चिमी संस्कृति प्रचलित करने का प्रयास कर रही थी इस स्थिति में एक धर्मगुरू के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति ने जन्म लिया। ईरान की इस्लामी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता धर्म, धार्मिक नेतृत्व और इसी प्रकार लोगों की भागीदारी थी।

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जिस चीज़ ने इन तीनों तत्वों को एक दूसरे से जोड़ दिया था वह इस क्रांति का पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के सदाचरण से पूरी तरह प्रभावित होना था। यह प्रभाव इतना व्यापक व शक्तिशाली था कि ईरान की इस्लामी क्रांति विश्व में एक न्यायप्रेमी और अन्याय विरोधी क्रांति के रूप में सामने आयी। यह ठीक उस समय में अस्तित्व में आयी जब यह विचार प्रचलित था कि धर्म लोगों को प्रतिरोध के लिए खड़ा नहीं कर सकता परंतु ईरान की इस्लामी क्रांति ने महान सामाजिक परिवर्तन के साथ यह सिद्ध कर दिया कि वह समाज में भारी परिवर्तन की क्षमता रखती है।

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धर्म की ओर वापसी, अन्याय और विश्व की बड़ी शक्तियों के मुकाबले में प्रतिरोध और समाज का सुधार धर्म का मूल उद्देश्य है और ईरान की इस्लामी क्रांति ने उससे बहुत लाभ उठाया।

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ईरान की इस्लामी क्रांति की घटनाओं के दौरान विश्ववासी साक्षी थे कि ईरानी राष्ट्र यद्यपि अपनी आर्थिक मांगों को पेश करता था परंतु हर चीज़ से अधिक नैतिक बुराइयों से मुकाबले, धार्मिक मूल्यों को जीवित करने और न्याय को व्यवहारिक बनाने जैसे मूल्यों पर भी बल देता था। इस प्रकार की भावना लोगों में प्रतिरोध की शक्ति प्रदान करती थी। ईरान की इस्लामी क्रांति में अध्यात्म और नैतिकता का विशेष स्थान था। क्रांतिकारी संघर्ष करने के साथ आत्म प्रशिक्षण का भी प्रयास करते थे। ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी भी इस विषय पर बहुत बल देते थे। वे इस संबंध में फरमाते थे जिस सीमा तक अप्रशिक्षित व्यक्ति समाज के लिए हानिकारक है उस सीमा तक कोई दूसरी चीज़ हानिकारक नहीं है और जिस सीमा तक प्रशिक्षित व्यक्ति समाज के लिए लाभदायक है कोई भी चीज़ उतनी लाभदायक नहीं है। ब्रह्मांड का आधार इंसान का प्रशिक्षण है।“

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ईरान की इस्लामी क्रांति ने यह विचार पेश किया कि नैतिकता व अध्यात्मक को जीवन के समस्त क्षेत्रों में होना चाहिये और राजनीतिक को धर्म का भाग होना चाहिये। अतः आवश्यकता इस बात की है कि राजनेता और शासक, सदाचारिता और न्यायप्रेम को अपना आदर्श बनायें ताकि विश्व में हर स्थान पर शांति व सुरक्षा स्थापित हो सके। ईरान की इस्लामी क्रांति के आने से एक बार फिर पैग़म्बरे इस्लाम के सदाचरण और धार्मिक शिक्षाओं की ओर वापसी हुई। इन विशेषताओं के साथ इस्लामी क्रांति ने दर्शा दिया कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के प्रयास के रूप में इस्लाम किसी समय या स्थान से विशेष नहीं है और इस्लाम के संबोधक समस्त काल के समस्त इंसान हैं और वह पूरी मानवता का कल्याण चाहता है। जिस चीज़ ने ईरान की इस्लामी क्रांति को धार्मिक पहचान प्रदान की वह इमाम ख़ुमैनी जैसे वरिष्ठ धर्मगुरू का व्यक्तित्व और उनके विचार थे। इमाम ख़ुमैनी धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से पूर्णरूप से होशियार व जागरुक थे और वे दूरगामी सोच रखते। इस प्रकार की विशेषता ने उन्हें देश के अंदर और बाहर लोगों के ध्यान का केन्द्र बना दिया। इमाम ख़ुमैनी से लोगों का गहरा संबंध और पूरी निष्ठा के साथ लोगों के इमाम खुमैनी के अनुसरण से इस बात की पुष्टि होती है।

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इस्लाम के अनुसार नेता व मार्गदर्शक की राजनीतिक शक्ति का आधार धार्मिक शिक्षाओं को होना चाहिये। यह एक धार्मिक, शक्तिशाली और लोकप्रिय नेता की पहचान होनी चाहिये। इस्लाम के अनुसार नेता और लोगों के मध्य एक आध्यात्मिक संबंध होना चाहिये। यह एक इस्लामी सरकार के स्पष्ट सिद्धांतों में से है कि लोगों और नेता के मध्य संबंध एक औपचारिक संबंध नहीं है बल्कि धार्मिक विश्वास के साथ दोनों पक्षों के मध्य प्रेम होता है। इस्लामी शासक पर इस्लाम के आदेशों को जानने और उसे लागू करने की ज़िम्मेदारी होती है और लोगों को भी उससे इसी प्रकार अपेक्षा होती है। ईरान में जिस वरिष्ठतम धार्मिक नेता के आदेशों का अनुपालन अनिवार्य होता है उसे “विलायते फक़ीह” के नाम से जाना जाता है।

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जिस तरह ईरान के लोग स्वर्गीय इमाम खुमैनी के आदेशों का पालन करते थे उसी प्रकार वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के आदेशों के अनुसरण को धार्मिक दायित्व समझते हैं। इमाम खुमैनी धार्मिक दायित्व के बोध के साथ इतिहास के बहुत बड़े संघर्षकर्ता थे। इमाम खुमैनी ने जिस संघर्ष का परिचय दिया वह महान हस्तियों के अतिरिक्त किसी ने अंजाम नहीं दिया और मुट्ठी भर लोगों के अलावा कोई सफल नहीं हुआ। इमाम खुमैनी की सफलता का महत्वपूर्ण रहस्य महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से उनका गहरा और निष्ठापूर्ण संबंध था। उन्होंने महान ईश्वर से संबंध स्थापित करके और दुनिया की बड़ी शक्तियों से हटकर नयी व्यवस्था का आधार रखा और उसका पहला अनुभव बहुत ही रोचक, आकर्षक, व्यापक और जनप्रिय था और उसने दुनिया के दूरस्थ क्षेत्रों को भी प्रभावित किया।

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इमाम खुमैनी ने विश्व वासियों के समक्ष नया राजनीतिक विचार पेश किया और वह मानवता एवं दुनिया के लिए नई बात थी। उन्होंने धर्म को राजनीति की दुनिया में सक्रिय रूप से प्रविष्ट किया। फ्रांसीसी विचारक व बुद्धिजीवी मिशेल फोको कहते हैं” इस्लामी क्रांति और इस्लामी शासन अध्यात्म को राजनीतिक जीवन में प्रविष्ट करने का मार्ग थी। धर्म इंसान के दिलों की गहराइयों में प्रविष्ट होकर भूमिका निभा सका और लोगों को उस सरकार के विरुद्ध उठ खड़ा होने के लिए प्रेरित किया जिसके पास शक्तिशाली सेना थी और उसे अमेरिकी समर्थन प्राप्त था। कोई भी राजनीतिक नेता यह दावा नहीं कर सकता कि लोग आयतुल्लाह ख़ुमैनी की भांति उससे शक्तिशाली व गहन संबंध रखते हैं।“

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मिशेल फोको के अनुसार ईरान की इस्लामी क्रांति की जान इस वास्तविकता में नीहित थी कि ईरानी अपनी क्रांति के माध्यम से स्वयं अपने अंदर बदलाव उत्पन्न करने के प्रयास में थे। वास्तव में उनका मूल उद्देश्य अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आधारभूत परिवर्तन उत्पन्न करना था। ईरानी अपनी जीवन शैली परिवर्तित करना चाहते थे और इस कार्य के लिए उन्होंने इस्लाम में सुधार का मार्ग देखा।

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ऐसा इस्लाम जो उनके दर्द की दवा और सामाजिक कमियों व बीमारियों का उपचार भी था। इस्लामी क्रांति के दौरान जो नारे थे उनसे ईरान की मुसलमान जनता की इच्छाओं को भली-भांति समझा जा सकता है कि इस क्रांति का मूल उद्देश्य इस्लाम को पुनर्जीवित करना, धार्मिक मूल्यों को महत्व देना और उनके आधार पर सरकार को चलाना था। इसी प्रकार इस क्रांति का एक उद्देश्य प्रचलित राजनीति से प्रभावित न होना था। अलबत्ता इन महान व बड़ी आकांक्षाओं के अंदर सामाजिक न्याय, आज़ादी, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में स्वतंत्रता व स्वाधीनता भी नीहित थी। ईरान की इस्लामी क्रांति का संदेश अध्यात्म, स्वतंत्र ढंग से सोचना और राष्ट्रों की स्वतंत्रता का सम्मान है। इस संदेश का स्रोत इस्लाम है जो मानवता को महत्व देता है और न्याय के साथ सुरक्षित जीवन को इंसान का स्वाभाविक अधिकार मानता है।

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ईरान की इस्लामी क्रांति ने ईमान, आज़ादी और मानवीय प्रतिष्ठा जैसे मूल्यों पर बल देने के साथ घोषणा की है कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में वह एक शक्तिशाली तत्व के रूप में इज़्ज़त और वास्तविक सफलता व कल्याण को मानवता को उपहार स्वरूप प्रदान कर सकता है। इस प्रकार से क्रांति और इस्लामी गणतंत्र ईरान इस समय एकेश्वरवाद की छत्रछाया में इंसानों का आह्वान कर रहे हैं कि वे जीवन के समस्त क्षेत्रों में ईश्वरीय आदेशों का पालन करें। ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने भी इस संबंध में बल देकर कहा है कि अगर इंसान ईमान के साथ सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और जीवन के दूसरे मामलों में ईश्वरीय आदेशों का पालन करे तो आज विश्व की जटिलतम समस्याओं का समाधान सरल हो जायेगा। आज दुनिया को भी इस बंद गली का सामना है और पैग़म्बरों के मार्गदर्शन के समक्ष नतमस्तक होने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है।“ 

 

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